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: बदि व नाइंसाफी के जबरजस्त प्रतिकार का प्रतीक है मोहर्रम शहादत की अनोखी मिसाल है मोहर्रम

Admin

Fri, Jul 28, 2023

बदनावर ( अल्ताफ मंसूरी) कर्बला की जंग हक के चंद मोमिनो व बदी  के हजारों यजीदियो के बीच हुई थी। मोहरम उस हुसैनी पाक पैगाम की याद दिलाता है कि आदमी को जिंदगी में गलत समझौता करने से ज्यादा उसूलों पर मरना बेहतर है। मोमिन को हर हाल में हक पर रहते हुए सब्र के साथ हर मुसीबत व कहर का सामना करना चाहिए। मोमिन को ईमान वह सच्ची राह से जुदा नहीं होना चाहिए। बदि व नाइंसाफी के जबरजस्त प्रतिकार का प्रतीक है ,मोहर्रम । शहादत की अनोखी मिसाल है ,मोहर्रम।

इस्लामिक कैलेंडर वर्ष मैं  मोहरम का महीना जिसका मर्तबा रमजान महीने के बाद दूसरा है इस महीने की 10 तारीख को इमाम हुसैन की शहादत के रूप में याद किया जाता है साथ ही मोहर्रम की 10 तारीख  इस्लामिक इतिहास में बहुत अहमियत रखती हैlइस्‍लाम धर्म के नए साल की शुरुआत मोहर्रम महीने से होती है, यानी कि मुहर्रम का महीना इस्‍लामी साल का पहला महीना होता है, इसे हिजरी भी कहा जाता है । इस दिन मुहर्रम को बदी पर नेकी की जीत की मिसाल माना जाता है।

इतिहास के पन्ने में इमाम हुसैन की मजहब को बचाने और बुराई के  खिलाफ लड़ने की बात दर्ज है। पैगंबर मोहम्मद सल्लल्लाहो सल्लम के नाती की शहादत व कर्बला के शहीदों के बलिदानों को याद किया जाता है ।कैसे तकरीबन 80,000 यजीद सैनिकों के सामने 72 बाहदुरों ने निडरता के साथ युद्ध लड़ा। जंग में वह अल्लाह के नाम पर कुर्बान हो गए। उन्होंने अपने खानदान द्वारा सिखाए हुए नेक आमाल, पाकीजा सोच और अल्लाह से बेपनाह मुहब्बत में प्यास, दर्द, भूख और पीड़ा सब पर फतह हासिल कर ली। 10वीं मुहर्रम के दिन तक इमाम हुसैन अपने भाइयों और अपने साथियों के  मय्यत को दफनाते रहे। इसके बाद आखिर में अस्र की नमाज के वक्त जब इमाम हुसैन सजदा में थे, तब एक यजीदी ने इमाम हुसैन पर धोखे से हमला कर दिया और हुसैन शहीद हो गए। कर्बला के शहीदों ने इस्लाम को नई ऊंचाई दी।

हुसैन का मकसद इस्‍लाम और इंसानियत को जिंदा रखना था। यह धर्म युद्ध इतिहास के पन्‍नों पर हमेशा के लिए दर्ज हो गया।  इमाम हुसैन कर्बला में शहीद होकर भी जीत गए वह यजीद जीत कर भी हार गया l पूरी दुनिया यजिद पर लानते भेजती हैl यही कारण है कि इस्लामी तारीख में मोहर्रम का बड़ा मर्तबा है।

किसी शायर ने खूब  कहा है...

*कर्बला को कर्बला के शहंशाह पर नाज़ है

उस नवासे पर मुहम्मद को नाज़ है

यूँ तो लाखों सिर झुके

सज़दे में लेकिन

हुसैन ने वो सज़दा किया जिस पर खुदा को नाज़ है *

मुहर्रम सुन्नी और शिया दोनों ही मुस्लिम समुदाय मनाते हैं लेकिन दोनों ही इसे अलग-अलग तरीके से मनाते हैं. शिया समुदाय के लोगों को मुहर्रम के महीने में 1 से 9 तारीख तक रोजा रखने की छूट होती है. शिया उलेमा के मुताबिक मुहर्रम के 10वें दिन रोजा रखना हराम होता है. वहीं सुन्नी समुदाय इस महीने की 9 और 10 तारीख को रोजा रखते हैं.वहीं, शिया मुसलमान इस दिन काले कपड़े पहनते हैं,जुलूस में हिस्सा लेते हैं, खूनी मातम मनाते हैं और इमाम हुसैन के ताजिया को ले जाते हैं. मोहर्रम के दौरान छबील व लंगर लगाने का बहुत सवाब है।

*10 मोहर्रम का महत्व*

इस्लामिक कैलेंडर के बारह महीनों में मोहर्रम का बड़ा महत्व है। माना जाता है कि इस पवित्र महीने में कई महत्वपूर्ण घटनाएं हुई। हजरत आदम दुनिया में आए, हज़रत नूह की कश्ती को दरिया के तूफ़ान में किनारा मिला, हज़रत मूसा और उनकी कौम को फिरऔन (तात्कालिन मिस्र का बादशाह) और उसके लश्कर से छुटकारा मिला और फिरऔन नील नदी में समां गया। इसी तारीख को कयामत आएगीl और भी कई बड़े वाकयात इस तारीख से जुड़े हुए हैं l

आशूरा का रोजा, गुनाहों से निजात दिलाता है lहदीस  के अनुसार पैगंबर मोहम्मद साहब ने कहा है कि गुनाहों से छुटकारा पाने के लिए दस मोहर्रम यौमे आशूरा पर यानी मोहर्रम महीने की दसवीं तारीख को रोजा रखना चाहिए। वहीं हदीस तिरमिज़ी शरीफ़ के अनुसार रमजान के रोजों के बाद मोहर्रम की दस तारीख का रोजा बहुत ही खास माना गया है। इस दिन रखे गए रोजे का भी खास महत्व होता है। इस दिन सुबह

असुरे की निफिल नमाज पढ़ी जाती है साथ ही असुरे की दुआ भी पढ़ी जाती है । मोहरम की 9, 10 तारीख बहुत अदब वाली व खास है अतः इन दोनों दिनों में की गई सभी इबादत  बहुत फायदेबंद है l मोमिन इन दिनों में अकीदत्त से लबरेज इबादत करते हैं। मोहर्रम को समझने के लिए क्या खूब स कहा है,,,,,

करीब अल्लाह के आओ तो कोई बात बने,

ईमान फिर से जगाओ तो कोई बात बने,

लहू जो बह गया कर्बला में,

उनके मकसद को समझो तो कोई बात बने।

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