भावपूर्ण श्रद्धांजलि : संघर्ष के साथ चिमनी की रोशनी मे पढाई कर कमाया नाम, कभी उसुले से समझौता नहीं किया ऐसे अफसर थे एसआर विश्वकर्मा
Bakhtavar Express
Sat, Jul 26, 2025

सरदारपुर । चलती का नाम ही जिंदगी ऐसे ही शख्सियत थे ग्रामीण यांत्रिकी सेवा के सेवानिवृत कार्यपालन यंत्री एसआर विश्वकर्मा। सरदारपुर तहसील के छोटे से गांव पदमपुरा के निवासी थे । शुक्रवार को देर रात श्री विश्वकर्मा इस दुनिया को अलविदा कहकर चले गये। वैसे तो उनका बचपन गरीबी एवं संघर्ष के बीच बीता था लेकिन पढने की ऐसी ललक थी की चिमनी की रोशनी मे पढ़ाई कर जिंदगी मे ईमानदारी के साथ वह नाम कमाया जिस पर उनके हर दोस्त कौ फर्क था। ग्रामीण यांत्रिकी सेवा मे उपयंत्री के पद से शुरुआत करने वाले विश्वकर्मा ने इंदौर जैसे महानगर मे कार्यपालन यंत्री रहते हुये सेवानिवृत्ति ली। इंदौर जैसे शहर मे आज भी इनकी देखरेख मे बनी कई शासकीय इमारत आज भी मजबूती के साथ खड़ी हुई है। कारपेंटर परिवार से आने वाले श्री विश्वकर्मा को कारीगरी का हुनर विरासत मे मिला था। अपनी नौकरी के दौरान प्रशिक्षण वे थर्माकोल के मॉडल बनाकर देते थे। एक दशक पुर्व वे जब शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हुये थे उन्होंने कभी अपने आप को यह महसूस नही होने दिया की वे वृद्ध हो गये। जब भी उनसे वार्तालाप होता तो बताते थे की चलती का नाम ही जिंदगी है। व्यक्ति को कभी यह नही मानना चाहिये की वह बुढा हो गया। समाज,धर्म सभी जगह श्री विश्वकर्मा सक्रियता के साथ लगे रहते थे। उनका हर दिन नयापन लाता था। कभी वेस्ट से बेस्ट बना देते तो कभी एतिहासिक ईमारतो एवं मंदिरो के चित्रो को कागजो पर हुबहु उकेर देते। यही नही हर वर्ष अपने मित्रो को हाथो से बनाया केेलेंडर भेंट करना कभी नही भुलते थे।
कुछ वर्ष पुर्व जब श्री विश्वकर्मा को अटैक आया और उनकी सर्जरी हुई तो अस्पताल मे भी उन्होने पेंटीग बनाना जारी रखा कभी यह एहसास ही नही होने दिया की वे एक गंभीर बीमारी का शिकार है।
23 अप्रैल को इंदौर मे उनसे जब रूबरू आखिरी मुलाकात हुई तो उन्होने अपनी शासकीय सेवा एंव सेवानिवृति के कई प्रसंग साझा किये श्री विश्वकर्मा बताते ही कभी उसुले से समझौता नही किया। जब भी कोई ऊंगली ऊंटी निडरता के साथ उसका सामना किया। नेता हो या अधिकारी कभी किसी के सामने झुके नही इसी का परिणाम रहा की अपनी 36 वर्ष की शासकीय सेवा मे 24 बार अच्छे कार्यों के लिये शासन की और से उन्हे पुरस्कृत कर सम्मानित किया। यही नही सेवानिवृत्ति के बाद भी अफसर उनसे सलाह लेते रहते थे। यदि कोई प्रशिक्षण हो या फिर किसी कार्य की मॉनिटरिंग हो अफसर श्री विश्वकर्मा को ही याद करते थे।
वैसे एसआर विश्वकर्मा मेरे मरहुम पिताजी मुस्लिम शेख के परम मित्र थे लेकिन जब उनसे पहली मुलाकात इंदौर मे आरईएस विभाग मे कार्यपालन यंत्री रहते हुए हुई थी तभी से उनसे मेरा सत्त संपर्क था। उनका मार्गदर्शन हमेशा मिलता रहा। वैसे अंकल भले ही आप इस दुनिया को छोडकर चले गये हो लेकिन आपकी कमी हमेशा खलती रहेगी।
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