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: शहीद नगरी अमझेरा अब तीर्थ क्षेत्र मे रूप मे होगी विकसित, अति प्राचीन द्वापर कालीन रुक्मणी हरण स्थल बनेगा तीर्थ,मुख्यमंत्री यादव ने कहा जहा जहा भगवान श्री कृष्ण ने लीला रची उन्हे तीर्थ बनाया जायेगा

Admin

Fri, Dec 22, 2023
https://youtu.be/SBMwJWrJ_q4

अभिजीत पंडित @ अमझेरा। अमझेरा का अपना पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्व रहा है। महाराणा बख्तावर सिंह के कारण अमझेरा को जहां शहीद नगरी का दर्जा मिला हुआ है। वही रुक्मणी हरण स्थल होने से इसका पौराणिक महत्व रहा है। लेकिन तीर्थ क्षेत्र के रूप मे इसका विकास नहीं हो पाया। गुरुवार को जहा मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने विधानसभा मे  अति प्राचीन द्वापर कालीन रुक्मणी हरण स्थल को तीर्थ क्षेत्र के रूप मे विकसित करने की घोषणा की वैसे ही क्षेत्र मे खुशी की लहर दौड गई।


मुख्यमंत्री श्री यादव ने विधानसभा मे अपने व्क्तव्य के दौरान कहा की जहां भगवान श्री कृष्ण ने लीला रची उन स्थानों को तीर्थ के रूप मे विकसित किया जायेगा। जिसमे महाकाल की नगरी उज्जैन, धार जिले का अमझेरा एवं भगवान परशुराम जी की जन्मस्थली जानापाव शामिल है। जैसे ही ये वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित हुआ अमझेरा मे हर्ष छा गया। हर कोई अपने वाटसअप स्टेटस, फेसबुक पर यह पोस्ट डालकर मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव का आभार व्यक्त कर रहे थे।


ऐतिहासिक एवं पौराणिक नगरी अमझेरा-
धार जिला मुख्यालय से 30 किमी दूर मांगोद मनावर मार्ग पर बसा अमझेरा नगर ऐतिहासिक एवं पौराणिक नगरी के रूप मे विख्यात है। नगर का प्राचीन नाम कुंदनपुर था जो अब अमझेरा है। प्राचीन किवदंती अनुसार द्वापर काल मे रुखमणि जी अम्बिका माता का पूजन करने अमका झमका मंदिर पहुंची थी तभी यहां रथ लेकर भगवान श्री कृष्ण आये और अपने साथ रुकमणी का हरण कर अपने साथ द्वारिका ले गये। मंदिर के पीछे आज भी रथ के पहिये के निशान इस बात का प्रमाण है।

परिसर मे ही चामुंडा माता मंदिर, भैरव जी, औघड़ बाबा के मंदिर एवं प्राचीन कुण्ड स्थित है। वही कुछ दूरी पर गुफा मे बैजनाथ महादेव, राज राजेश्वर महादेव एवं झमका माता के मंदिर स्थित है। अति प्राचीन स्थान होने से यहां आत्मिक शांति का अनुभव होता है। वर्षा ऋतू मे यह स्थान प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण होकर कल कल करते झरने आनंदित करते है।

गुजरात, महाराष्ट्र सहित अन्य प्रदेशो से भी बड़ी संख्या मे यहां श्रद्धालु देवी का पूजन करने पहुंचते है। यहा सच्चे मन से की गई प्रार्थना स्वीकार होती है। मंदिर परिसर मे जनसहयोग से वर्तमान मे जीर्णाेद्धार के कार्य किये जा रहे है।
1857 की क्रांति मे अपने प्राणो की आहुति देने वाले अमझेरा नरेश महाराव बख्तावर सिंह राठौड़ का किला भी यही स्थित है। 

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